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Channel: सुरभित रचना
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इनसे मिलिए ( नख शिख वर्णन ) : दुष्यंत कुमार

पाँवों से सर तक जैसे एक जनूनबेतरतीबी से बढे हुए नाखूनकुछ टेढ़े- मेढ़े बैंगे दागिल पाँवजैसे कोई एटम से उजड़ा गाँवटखने ज्यों मिले हुए रक्खे हों बाँसपिंडलियाँ कि जैसे हिलती-डुलती काँसकुछ ऐसे लगते हैं घुटनों...

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शब्दों से कभी कभी काम नहीं चलता : त्रिलोचन

शब्दों से कभी कभी काम नहीं चलताजीवन को देखा हैयहाँ कुछ औरवहाँ कुछ औरइसी तरह यहाँ-वहाँहरदम कुछ औरकोई एक ढ़ंग सदा काम नहीं करतातुम को भी चाहूँ तोछूकर तरंगपकड़ रखूँ संगकितने दिन कहाँ-कहाँरख लूँगा रंगअपना भी...

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प्रपात के प्रति : निराला

अंचलकेचंचलक्षुद्रप्रपात !मचलतेहुएनिकलआतेहो;उज्जवल! घन-वन-अंधकारकेसाथखेलतेहोक्यों? क्यापातेहो ?अंधकारपरइतनाप्यार,क्याजानेयहबालककाअविचारबुद्धकायाकिसाम्य-व्यवहार...

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अलविदा के बाद : रवीन्द्र भट्ठल

तेरे जाने के पहले, सूरज उदास भी होता थासूरज अस्त भी होता थाहर रोज़ रात सरों पर छत्र करती थीसितारों की फुलकारी,हवा गाती थीधूप नृत्य करती थी.अँधेरा अपने लम्बे सुर में मस्त थाहँसी की कूल थी, बोलों की बबूल...

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प्रतीक्षा-गीत : अज्ञेय

हरकिसीकेभीतरएकगीतसोताहैजोइसीकाप्रतीक्षमानहोताहैकिकोईउसेछूकरजगादेजमीपरतेंपिघलादेऔरएकधारबहादे।परओमेरेप्रतीक्षितमीतप्रतीक्षास्वयंभीतोहैएकगीतजिसेमैनेबारबारजागकरगायाहैजब-जबतुमनेमुझेजगायाहै।उसीकोतोआजभीगाताहू...

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सायंकाल : रधुवीर सहाय

"...बहरहाल, इस तरह की कोशिशें विचार वस्तु के दिल और दिमाग़ पर उतरनें के तरीक़े पर निर्भर रहेंगी और ज़रूरी है कि हम अपनी अनुभूति को उसी प्रकार सुधारें, ताकि कविता भी वैसी ही जानदार हो सके जैसी कि वे...

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उदास वक़्तों में : नवतेज भारती

उदास वक़्तों में भी, जुगनू लौ करते हैंसितारे टिमटिमाते हैंऔर कवि कविता लिखते हैंउदास वक़्तों में भीघास के तृण उगते हैंपक्षी गाते और फूल खिलते हैंउदास समय में भीलोग सपने लेते हैंदरिया बहते हैं और सूर्य...

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शब्द रोशनी वाले : नवतेज भारती

जिस शब्द में से प्रकाश नही फूटताउसको काग़ज़ पर मत रखकोरा सफ़ेद काग़ज़काले अक्षरों से ज़्यादा मोल का होता है.’पंजाबीकी श्रेष्ट प्रेम-कविताएं’ से

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जो चलते हैं : नवतेज भारती

यदि मैं चलता चलता रुक जाऊंतब मेरे पांव ,उनको दे देना, जो चलते हैंआंखे उनको, जो देखते हैंदिल उनको, जो प्यार करते हैं.’पंजाबी की श्रेष्ट प्रेम-कविताएं’ से

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एक भावना : हरिनारायण व्यास

पुरानी मान्यताओं, पुराने शब्दों, पुरानी कहावतों को नये अर्थ से विभूषित कर के कविता ,में प्रयोग करने से पाठक की अनुभूतियों को छूने में सहायता मिलती है।हरिनारायण व्यास**************इस पुरानी ज़िन्दगी की...

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रुबाई : शमशेरबहादुर सिंह

हम अपने ख़्याल को सनम समझे थेअपने को ख़्याल से भी कम समझे थे’होना था’- समझना न था कुछ भी ’शमशेर’होना भी कहाँ था वो जो हम समझे थे।’दूसरा सप्तक’ से

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सूखे पीले पत्तों ने कहा - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तेज़ी से जाते हुई कार के पीछेपथ पर गिरे पड़ेनिर्जीव सूखे पीले पत्तों ने भीकुछ दूर दौड़ कर गर्व से कहा----’हम में भी गति है,सुनो, हम में भी जीवन है,रुको-रुको हम भीसाथ चलते हैंहम भी प्रगतिशील हैं।’लेकिन उन...

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जयशंकर प्रसाद

सबजीवनबीताजाताहैधूपछाँहकेखेलसदॄशसबजीवनबीताजाताहैसमयभागताहैप्रतिक्षणमें,नव-अतीतकेतुषार-कणमें,हमेंलगाकरभविष्य-रणमें,आपकहाँछिपजाताहैसबजीवनबीताजाताहैबुल्ले, नहर,...

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पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस : सुमित्रानंदन पंत

चिरप्रणम्ययहपुष्यअहन, जयगाओसुरगण,आजअवतरितहुईचेतनाभूपरनूतन !नवभारत, फिरचीरयुगोंकातिमिर-आवरण,तरुणअरुण-साउदितहुआपरिदीप्तकरभुवन !सभ्यहुआअबविश्व, सभ्यधरणीकाजीवन,आजखुलेभारतकेसंगभूकेजड़-बंधन...

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पर्वतारोही : रामधारी सिंह दिनकर

मैं पर्वतारोही हूँ।शिखर अभी दूर है।और मेरी साँस फूलनें लगी है।मुड़ कर देखता हूँकि मैनें जो निशान बनाये थे,वे हैं या नहीं।मैंने जो बीज गिराये थे,उनका क्या हुआ?किसान बीजों को मिट्टी में गाड़ करघर जा कर...

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ताजमहल की छाया में : अज्ञेय

मुझ में यह सामर्थ्य नहीं है मैं कविता कर पाऊँ,या कूँची में रंगों ही का स्वर्ण-वितान बनाऊँ ।साधन इतनें नहीं कि पत्थर के प्रसाद खड़े कर-तेरा, अपना और प्यार का नाम अमर कर जाऊँ।पर वह क्या कम कवि है जो कविता...

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करघा : रामधारी सिंह ’दिनकर’

हर ज़िन्दगी कहीं न कहींदूसरी ज़िन्दगी से टकराती है।हर ज़िन्दगी किसी न किसीज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है ।ज़िन्दगी ज़िन्दगी सेइतनी जगहों पर मिलती हैकि हम कुछ समझ नहीं पातेऔर कह बैठते हैं यह भारी झमेला...

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क्यों कि तुम हो : अज्ञेय

मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती हैतारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती हैक्यों कि तुम हो।फुटकी सी लहरिल उड़ानशाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती हैजुगनू की छोटी-सी द्युति में...

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नव दृष्टि : सुमित्रानंदन पंत,( जन्म-२० मई,१९००)

खुल गये छन्द के बन्ध ,प्रास के रजत पाश,अब गीत मुक्त,औ’ युग-वाणी बहती अयास !बन गये कलात्मक भावजगत के रूप-नाम,जीवन-संघर्षण देता सुख,लगता ललाम!सुन्दर, शिव,सत्यकला के कल्पित माप-मानबन गये स्थूल,जग-जीवन से...

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आशी: - त्रिलोचन

पृथ्वी सेदूब की कलाएँ लोचारऊषा सेहल्दिया तिलक लोऔरअपनें हाथों मेंअक्षत लोपृथ्वी आकाशजहाँ कहींतुम्हें जाना होबढ़ोबढ़ो('अरधान' से )त्रिलोचन पर एक लेख

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